Kakabhushundi
हिमालय की ऊँची चोटियों पर उस दिन सूर्य की पहली किरणें धीरे-धीरे बर्फ़ से ढकी शिलाओं को स्वर्णिम बना रही थीं। हवा में देवदार के वृक्षों की सुगंध घुली हुई थी, और दूर कहीं एक शांत सरोवर का जल बिना किसी हलचल के आकाश का प्रतिबिंब समेटे हुए था।
उसी पर्वत पर एक प्राचीन वटवृक्ष खड़ा था।
कहा जाता था कि उस वृक्ष ने असंख्य युगों का परिवर्तन देखा था। उसकी जड़ें धरती की गहराइयों तक जाती थीं और उसकी शाखाएँ मानो आकाश से संवाद करती थीं।
उसकी सबसे ऊँची डाल पर एक कौआ बैठा था।
पर वह साधारण कौआ नहीं था।
उसकी आँखों में ऐसा तेज था, जिसे देखकर बड़े-बड़े ऋषि भी सम्मान से अपना मस्तक झुका देते थे। उसके मुख से हर श्वास के साथ केवल एक ही नाम निकलता—
"राम..."
उस नाम की ध्वनि इतनी मधुर थी कि आसपास बैठी चिड़ियाँ भी चहचहाना भूल जातीं।
कई ऋषि मौन भाव से उसकी वाणी सुन रहे थे।
उसी समय आकाश में विशाल पंखों की छाया फैली।
वह थे—
गरुड़।
उनकी गति वज्र के समान तीव्र थी, किंतु आज उनके मुख पर विजय का नहीं, जिज्ञासा का भाव था।
उन्होंने वटवृक्ष के समीप उतरकर उस कौए को देखा और मन ही मन सोचा—
"क्या यही काकभुशुण्डि हैं? जिनके ज्ञान की चर्चा स्वयं देवर्षि नारद ने की थी?"
गरुड़ ने हाथ जोड़कर प्रणाम किया।
कौए ने धीरे-धीरे अपनी आँखें खोलीं।
उनकी दृष्टि में न कोई आश्चर्य था, न औपचारिकता—मानो वे पहले से जानते हों कि कौन आने वाला है।
वे मुस्कुराए।
"आइए गरुड़जी... बहुत दिनों से आपकी प्रतीक्षा थी।"
गरुड़ क्षणभर के लिए स्तब्ध रह गए।
उन्होंने अपने आने का समाचार किसी को नहीं दिया था।
"आप... मेरा नाम कैसे जानते हैं?"
काकभुशुण्डि हल्के से हँसे।
"जिसे श्रीराम की कृपा प्राप्त हो जाए, उसके लिए समय और दूरी दोनों पर्दे मात्र रह जाते हैं।"
गरुड़ उनके चरणों के निकट बैठ गए।
कुछ देर तक दोनों के बीच मौन छाया रहा।
वह मौन भी किसी मंत्र से कम नहीं था।
अंततः गरुड़ बोले—
"महात्मन्... मेरे मन में एक प्रश्न है। यदि श्रीराम स्वयं परमब्रह्म हैं, तो उन्होंने मनुष्य की भाँति दुःख क्यों सहा? वनवास, वियोग और युद्ध—इन सबकी आवश्यकता क्या थी?"
काकभुशुण्डि ने आकाश की ओर देखा।
हल्की हवा चली।
वटवृक्ष की पत्तियाँ सरसराईं, मानो वे भी उस प्रश्न का उत्तर सुनना चाहती हों।
उन्होंने धीरे से कहा—
"इस प्रश्न का उत्तर देने से पहले तुम्हें मेरी कथा जाननी होगी।"
गरुड़ ने विस्मय से पूछा—
"क्या आपकी कथा भी श्रीराम से जुड़ी है?"
काकभुशुण्डि की आँखों में एक गहरी स्मृति उतर आई।
"हाँ... पर उससे पहले मैं वह नहीं था, जिसे आज तुम देख रहे हो।"
"मैं एक ब्राह्मण था..."
"युवा था..."
"विद्वान था..."
"और सबसे बड़ी बात..."
वे कुछ क्षण रुके।
उनकी आवाज़ धीमी हो गई।
"...मैं अपने ज्ञान के अभिमान में अंधा हो चुका था।"
इतना कहते ही उनकी आँखें बंद हो गईं।
मानो हज़ारों वर्ष पुरानी स्मृतियाँ फिर से जीवित हो उठी हों...
वटवृक्ष की पत्तियाँ मंद हवा में झूम रही थीं। गरुड़ की दृष्टि काकभुशुण्डि के मुख पर टिकी थी। उनके शब्दों में ऐसा आकर्षण था कि समय मानो थम गया हो।
काकभुशुण्डि ने गहरी साँस ली और अतीत के पन्ने खुलने लगे...
बहुत समय पहले, जब धरती पर धर्म की ज्योति और भी प्रखर थी, अयोध्या के समीप एक समृद्ध ब्राह्मण परिवार में एक बालक का जन्म हुआ।
उसका नाम था भुशुण्डि।
बाल्यकाल से ही उसकी बुद्धि अत्यंत तीव्र थी। वेद, उपनिषद, पुराण और शास्त्र—जो भी उसके सामने आता, वह शीघ्र ही कंठस्थ कर लेता।
लोग कहते—
"यह बालक साधारण नहीं है। यह भविष्य में महान विद्वान बनेगा।"
माता-पिता का हृदय गर्व से भर उठता।
यौवन आते-आते भुशुण्डि दूर-दूर तक प्रसिद्ध हो गया। बड़े-बड़े पंडित उससे शास्त्रार्थ करने आते और पराजित होकर लौटते।
धीरे-धीरे प्रशंसा ने उसके मन में एक अदृश्य बीज बो दिया।
अभिमान।
पहले वह दूसरों के ज्ञान का सम्मान करता था, अब उनकी त्रुटियाँ खोजने लगा।
पहले वह विनम्र था, अब उसकी वाणी कठोर होने लगी।
एक दिन उसके पिता ने कहा—
"पुत्र, ज्ञान तभी फल देता है जब उसके साथ विनम्रता हो।"
भुशुण्डि मुस्कराया।
"पिताश्री, आज मेरे समान विद्वान इस प्रदेश में कौन है?"
उन शब्दों ने पिता का हृदय दुखा दिया।
उन्होंने केवल इतना कहा—
"जिस दिन मनुष्य स्वयं को सबसे बड़ा समझने लगता है, उसी दिन उसका पतन प्रारंभ हो जाता है।"
परंतु भुशुण्डि ने यह बात हँसी में उड़ा दी।
कुछ समय बाद वह एक महान शिवभक्त गुरु के आश्रम में पहुँचा।
गुरु का तेज इतना प्रखर था कि उनके समीप पहुँचते ही अनेक शिष्यों का अहंकार स्वयं झुक जाता।
भुशुण्डि ने भी उनके चरण स्पर्श किए।
गुरु ने प्रेम से उसे स्वीकार कर लिया।
वर्षों तक उन्होंने उसे केवल शास्त्र ही नहीं, भक्ति, सेवा और विनम्रता का भी ज्ञान दिया।
किन्तु ज्ञान तो भुशुण्डि ग्रहण करता रहा...
विनम्रता उसके हृदय में प्रवेश ही न कर सकी।
एक दिन आश्रम में भगवान शिव की महिमा का वर्णन हो रहा था।
गुरु बोले—
"शिव और विष्णु में कोई भेद नहीं। दोनों एक ही परम सत्य के दो स्वरूप हैं।"
यह सुनते ही भुशुण्डि के मन में विरोध उठ खड़ा हुआ।
वह केवल एक ही स्वरूप की उपासना को श्रेष्ठ मानता था और अन्य देवों का आदर करने को तैयार नहीं था।
उसने ऊँचे स्वर में कहा—
"गुरुदेव, आप यह कैसे कह सकते हैं? मेरे मत में केवल मेरी उपासना ही सर्वोच्च है।"
आश्रम में सन्नाटा छा गया।
किसी शिष्य ने कभी गुरु से इस प्रकार वाद-विवाद नहीं किया था।
गुरु ने शांत स्वर में समझाया—
"पुत्र, ईश्वर एक है। अलग-अलग रूप केवल भक्तों की भक्ति के मार्ग हैं।"
लेकिन अभिमान सुनता नहीं।
भुशुण्डि का स्वर और कठोर हो गया।
"यदि मेरी बात स्वीकार नहीं, तो मैं इस आश्रम में क्यों रहूँ?"
गुरु ने फिर भी क्रोध नहीं किया।
उन्होंने केवल अपनी आँखें बंद कर लीं और भगवान शिव का स्मरण करने लगे।
उसी क्षण...
आकाश में बादल घिर आए।
बिना वर्षा के बिजली चमक उठी।
धरती हल्के-हल्के काँपने लगी।
आश्रम के सभी शिष्य भयभीत होकर बाहर की ओर देखने लगे।
मंदिर के भीतर स्थापित शिवलिंग से एक अद्भुत प्रकाश प्रकट हुआ।
वातावरण में डमरू की गूँज सुनाई दी।
भुशुण्डि के शरीर में पहली बार भय की लहर दौड़ गई।
उसे लगा, जैसे स्वयं कैलाश का मौन उस आश्रम में उतर आया हो...
और तभी...
एक गंभीर, गूँजती हुई दिव्य वाणी पूरे आश्रम में फैल गई—
"जो अपने गुरु का अपमान करता है, वह अपने ज्ञान का भी अपमान करता है..."
भुशुण्डि के चेहरे का रंग उड़ गया।
उसने काँपते हुए चारों ओर देखा...
पर वह दिव्य स्वर किसका था?
आकाश में गूँजती हुई वह दिव्य वाणी सुनकर पूरा आश्रम भय और श्रद्धा से भर गया।
हवा अचानक स्थिर हो गई।
अग्निकुंड की लपटें बिना हवा के ही ऊँची उठने लगीं। मंदिर में स्थापित शिवलिंग से निकलता हुआ प्रकाश पूरे आश्रम को आलोकित कर रहा था।
भुशुण्डि के हाथ काँपने लगे।
उसका अभिमान पहली बार डगमगाया।
तभी उस दिव्य प्रकाश से भगवान महादेव का तेजस्वी स्वर प्रकट हुआ—
"हे ब्राह्मण! विद्या का अभिमान मनुष्य को अंधा बना देता है। जिसने अपने गुरु का अपमान किया, उसने ज्ञान की जड़ को ही काट दिया।"
यह सुनते ही सभी शिष्य भूमि पर दंडवत लेट गए।
भुशुण्डि भी घुटनों के बल बैठ गया, परंतु उसके भीतर का अहंकार अभी पूरी तरह टूटा नहीं था।
उसने काँपती आवाज़ में कहा—
"प्रभो... मैंने सत्य ही कहा था।"
यह सुनकर महादेव का स्वर और गंभीर हो गया।
"जिसे अपने मत के अतिरिक्त कुछ दिखाई न दे, वह सत्य का अधिकारी नहीं हो सकता।"
आकाश में बिजली कौंधी।
शिवलिंग से निकला प्रकाश अग्नि की तरह चमका।
महादेव बोले—
"हे अभिमानी ब्राह्मण! तेरा ज्ञान तुझे विनम्र नहीं बना सका। इसलिए तू ऐसे जन्म को प्राप्त होगा, जिसे संसार तुच्छ समझता है।"
"तू कौए की योनि में जन्म लेगा!"
ये शब्द सुनते ही भुशुण्डि का हृदय जैसे रुक गया।
उसकी आँखों से आँसू बह निकले।
जिस ज्ञान पर उसे गर्व था, उसी ने उसे शाप का पात्र बना दिया था।
वह गुरु के चरणों में गिर पड़ा।
"गुरुदेव... मुझे बचा लीजिए।"
आश्रम में सन्नाटा छा गया।
गुरु ने अपने शिष्य के सिर पर हाथ रखा।
उनकी आँखों में क्रोध नहीं, केवल करुणा थी।
वे भगवान शिव से प्रार्थना करने लगे—
"हे नीलकंठ! यह बालक भूल कर बैठा है। इसका अपराध बड़ा है, परंतु आपकी करुणा उससे भी बड़ी है। यदि शाप देना ही है, तो उसमें कृपा का मार्ग भी छोड़ दीजिए।"
गुरु की प्रार्थना सुनकर वातावरण बदलने लगा।
महादेव का स्वर पहले जैसा कठोर नहीं रहा।
कुछ क्षण मौन रहने के बाद वे बोले—
"गुरु की प्रार्थना कभी व्यर्थ नहीं जाती। मेरा शाप अटल है, परंतु उसमें मेरी कृपा भी होगी।"
पूरा आश्रम ध्यान से सुनने लगा।
महादेव ने कहा—
"कौए का शरीर मिलने पर भी तेरा ज्ञान नष्ट नहीं होगा।"
"तुझे भगवान श्रीराम की अखंड भक्ति प्राप्त होगी।"
"समय तुझे बाँध नहीं सकेगा।"
"कल्पों का परिवर्तन भी तुझे स्पर्श नहीं करेगा।"
"तू बार-बार श्रीराम की दिव्य लीलाओं का दर्शन करेगा और जो भी श्रद्धा से तेरा सत्संग करेगा, उसके मन के संशय दूर होंगे।"
यह सुनते ही भुशुण्डि फूट-फूटकर रोने लगा।
उसे पहली बार समझ आया—
गुरु का अपमान केवल गुरु का नहीं, स्वयं ईश्वर का अपमान होता है।
उसने गुरु के चरण पकड़ लिए।
"गुरुदेव... मुझे क्षमा कर दीजिए।"
गुरु ने उसे उठाया।
"पुत्र, ईश्वर का न्याय कठोर हो सकता है, पर उनकी कृपा अनंत है। अब अपने अभिमान को त्याग दो। यही तुम्हारा नया जन्म है।"
उसी क्षण भुशुण्डि ने संकल्प लिया—
"आज से मेरा जीवन केवल भगवान श्रीराम की भक्ति के लिए होगा।"
उसे यह ज्ञात नहीं था कि आगे चलकर वही शाप संसार के सबसे बड़े वरदानों में बदल जाएगा।
एक दिन ऐसा आएगा जब स्वयं गरुड़, देवता और महर्षि उसके चरणों में बैठकर रामकथा सुनेंगे।
और वह कौआ, जिसे संसार साधारण समझेगा, युगों-युगों तक श्रीराम के नाम का अमर गायक बन जाएगा.
रात गहरी हो चुकी थी।
आश्रम के आँगन में चंद्रमा का प्रकाश बिखरा हुआ था। सभी शिष्य विश्राम को जा चुके थे, पर भुशुण्डि की आँखों से नींद कोसों दूर थी।
महादेव का शाप उसके कानों में बार-बार गूँज रहा था—
"तू कौए की योनि में जन्म लेगा..."
उसका हृदय पछतावे से भर उठा।
वह आश्रम के पीछे बहती नदी के तट पर जाकर बैठ गया। चंद्रमा की परछाईं जल में काँप रही थी, जैसे उसका अपना मन।
उसने पहली बार जीवन में अपने ज्ञान पर नहीं, अपने अहंकार पर विचार किया।
धीरे-धीरे उसकी आँखों से आँसू बहने लगे।
उसने दोनों हाथ जोड़कर आकाश की ओर देखा।
"हे महादेव! मैंने अपने गुरु का अपमान किया। मैं अपने अपराध का दंड स्वीकार करता हूँ। पर एक प्रार्थना है..."
उसकी आवाज़ भर्रा गई।
"...मुझसे आपका और मेरे गुरु का स्मरण कभी न छूटे।"
उसी समय उसके गुरु वहाँ आ पहुँचे।
उन्होंने कुछ नहीं कहा।
बस उसके पास बैठ गए।
कुछ देर तक दोनों मौन रहे।
फिर गुरु ने शांत स्वर में कहा—
"पुत्र, क्या जानते हो, भगवान ने तुम्हें सबसे बड़ा दंड दिया है या सबसे बड़ा वरदान?"
भुशुण्डि ने आश्चर्य से उनकी ओर देखा।
"गुरुदेव... कौए का जन्म भी कोई वरदान हो सकता है?"
गुरु मुस्कुराए।
"शरीर कभी मनुष्य को महान नहीं बनाता। महान बनाती है उसकी भक्ति।"
उन्होंने भुशुण्डि के सिर पर हाथ रखा।
"जिसे श्रीराम का नाम मिल जाए, उसके लिए कोई जन्म छोटा नहीं होता।"
उस दिन से भुशुण्डि बदल गया।
जो युवक कभी अपने ज्ञान का प्रदर्शन करता था, वही अब आश्रम में सबसे पहले उठता।
वह आँगन साफ़ करता।
गौशाला की सेवा करता।
अतिथियों के लिए जल भरकर लाता।
रसोई में लकड़ियाँ काटता।
कई बार नए शिष्य उसे पहचान भी नहीं पाते।
एक दिन एक बालक ने पूछा—
"भैया, आप इतने बड़े विद्वान होकर भी यह सब काम क्यों करते हैं?"
भुशुण्डि मुस्कुराया।
"जिसने सेवा नहीं सीखी, उसने ज्ञान भी नहीं सीखा।"
गुरु दूर खड़े यह सब देख रहे थे।
उनकी आँखों में संतोष था।
वर्ष बीतते गए।
भुशुण्डि का अभिमान अब विनम्रता में बदल चुका था।
एक दिन गुरु ने उसे अपने पास बुलाया।
"पुत्र..."
"अब समय आ गया है कि मैं तुम्हें वह मंत्र दूँ, जो सभी मंत्रों का सार है।"
भुशुण्डि ने श्रद्धा से मस्तक झुका दिया।
गुरु ने उसके कान में केवल दो अक्षर कहे—
"राम..."
बस...
इतना ही।
न कोई लंबा मंत्र।
न कोई कठिन साधना।
केवल...
राम।
जैसे ही वह नाम उसके कानों में पड़ा, उसे लगा मानो उसके भीतर वर्षों से जमा अंधकार टूट गया हो।
उसकी आँखें स्वयं बंद हो गईं।
हृदय में एक ऐसी शांति उतरी, जिसे शब्दों में बाँधना असंभव था।
उस दिन पहली बार उसने समझा—
ज्ञान से मन शांत नहीं होता...
भक्ति से होता है।
उस दिन के बाद भुशुण्डि का जीवन बदल गया।
वह जहाँ भी जाता, केवल रामनाम का जप करता।
चलते समय—
"राम..."
बैठते समय—
"राम..."
सोते समय—
"राम..."
जागते समय—
"राम..."
धीरे-धीरे उसे संसार की वस्तुएँ फीकी लगने लगीं।
अब उसे केवल एक ही इच्छा थी—
एक बार प्रभु श्रीराम के दर्शन हो जाएँ।
उसे नहीं पता था कि उसकी यह प्रार्थना शीघ्र ही पूरी होने वाली है।
और उस दिन...
उसका जीवन ही नहीं...
उसका जन्म भी बदल जाएगा।
रात के अंतिम पहर आश्रम में गहरा सन्नाटा था।
केवल एक कुटिया के भीतर दीपक की लौ जल रही थी।
भुशुण्डि पद्मासन में बैठे थे।
उनकी आँखें बंद थीं और होंठों पर केवल एक ही नाम था—
"राम... राम... राम..."
हर श्वास के साथ रामनाम भीतर उतरता जा रहा था। समय का बोध मिटने लगा। शरीर का भार हल्का होने लगा।
उसी क्षण आश्रम में एक अद्भुत सुगंध फैल गई।
वातावरण में ऐसा लगा मानो असंख्य कमल एक साथ खिल उठे हों।
भुशुण्डि ने धीरे-धीरे नेत्र खोले।
उनके सामने उनके गुरुदेव खड़े थे।
गुरु के चेहरे पर एक अलौकिक मुस्कान थी।
"पुत्र..."
"समय आ गया है।"
भुशुण्डि समझ नहीं पाए।
"किस बात का समय, गुरुदेव?"
गुरु बोले—
"महादेव का शाप अब पूर्ण होगा।"
कुछ क्षण के लिए भुशुण्डि का हृदय काँप उठा।
परंतु इस बार उनके भीतर भय नहीं था।
उन्होंने शांत भाव से गुरु के चरणों में प्रणाम किया।
"यदि यह भगवान की इच्छा है, तो मैं उसे प्रसाद मानकर स्वीकार करता हूँ।"
गुरु की आँखों में संतोष छलक उठा।
सूर्योदय से पहले पूरा आश्रम एकत्र हो गया।
यज्ञ की अग्नि प्रज्वलित थी।
ऋषि वैदिक मंत्रों का उच्चारण कर रहे थे।
अचानक आकाश में तेज़ प्रकाश फैल गया।
वही दिव्य स्वर पुनः गूँजा—
"हे भुशुण्डि! शाप का समय आ पहुँचा है, परंतु तुम्हारी भक्ति ने उसे कृपा में बदल दिया है।"
भुशुण्डि ने हाथ जोड़ दिए।
"प्रभो, अब मेरे मन में कोई इच्छा नहीं।"
"बस इतना वर दीजिए कि मैं जन्म-जन्मांतर तक श्रीराम का नाम न भूलूँ।"
कुछ क्षण मौन रहा।
फिर भगवान शिव की वाणी आई—
"तथास्तु!"
जैसे ही यह शब्द गूँजा...
भुशुण्डि के शरीर से तेजस्वी प्रकाश निकलने लगा।
उनका मनुष्य शरीर धीरे-धीरे लुप्त होने लगा।
आश्रम के सभी शिष्य विस्मय से यह दृश्य देख रहे थे।
क्षण भर बाद...
वहाँ एक काला कौआ बैठा था।
पर उसकी आँखों में वही तेज था।
उसके मुख से पहला शब्द निकला—
"श्रीराम..."
गुरु की आँखें भर आईं।
उन्होंने उस छोटे से पक्षी को अपने हाथों में उठाया।
"आज मेरा शिष्य नहीं बदला..."
"आज उसका अहंकार समाप्त हुआ है।"
कुछ दिनों बाद काकभुशुण्डि ने गुरु से विदा ली।
गुरु ने जाते समय केवल एक वाक्य कहा—
"जहाँ रामकथा हो, वहीं तुम्हारा घर होगा।"
काकभुशुण्डि ने आकाश की ओर उड़ान भरी।
पहली बार उन्हें लगा कि वे केवल उड़ नहीं रहे...
बल्कि बंधनों से मुक्त हो रहे हैं।
वे पर्वतों, नदियों और वनों को पार करते हुए अंततः नील पर्वत पहुँचे।
वहाँ एक विशाल वटवृक्ष खड़ा था।
उन्हें ऐसा लगा मानो वह वृक्ष वर्षों से उनकी प्रतीक्षा कर रहा हो।
वे उसकी सबसे ऊँची शाखा पर बैठ गए।
आँखें बंद कीं।
और रामनाम का जप आरंभ कर दिया।
दिन बीते...
महीने बीते...
वर्ष बीत गए...
उनके लिए समय का कोई अर्थ नहीं रह गया।
एक दिन ध्यान में लीन काकभुशुण्डि ने अपने सामने एक दिव्य प्रकाश देखा।
उस प्रकाश में उन्हें एक बालक दिखाई दिया।
श्यामवर्ण...
कमल जैसी आँखें...
मधुर मुस्कान...
हाथ में धनुष...
काकभुशुण्डि का हृदय जोर से धड़कने लगा।
क्या यह...
स्वयं श्रीराम थे?
उनकी आँखों से अश्रुधारा बह निकली।
वे वृक्ष की शाखा से नीचे गिर पड़े और पुकार उठे—
"प्रभु...!"
उसी क्षण वह दिव्य प्रकाश और अधिक प्रखर हो गया...
और पूरा नील पर्वत "राम... राम..." की ध्वनि से गूँज उठा।
नील पर्वत की चोटी पर रात उतर चुकी थी।
आकाश असंख्य तारों से भरा था। मंद पवन वटवृक्ष की शाखाओं को छूती हुई गुजर रही थी। काकभुशुण्डि उसी वृक्ष की सबसे ऊँची डाल पर बैठे, नेत्र बंद किए, श्रीराम के नाम का जप कर रहे थे।
उनका मन अब संसार से बहुत दूर निकल चुका था।
न उन्हें भूख का ज्ञान था, न प्यास का।
केवल एक ही आकांक्षा थी—
"प्रभु... एक बार अपने दर्शन दे दीजिए।"
दिन महीनों में बदले।
महीने वर्षों में।
पर उनका जप नहीं रुका।
एक दिन ब्रह्ममुहूर्त का समय था।
पूर्व दिशा में हल्की लालिमा फैल रही थी।
अचानक पूरा पर्वत एक दिव्य प्रकाश से भर गया।
वटवृक्ष की प्रत्येक पत्ती मानो स्वर्ण बन गई।
पक्षियों का कलरव एकाएक थम गया।
समय जैसे स्थिर हो गया।
काकभुशुण्डि ने धीरे-धीरे अपनी आँखें खोलीं।
उनके सामने एक बालक खड़ा था।
श्यामवर्ण।
विशाल कमल जैसे नेत्र।
माथे पर तेज।
पीताम्बर।
हाथ में एक छोटा-सा धनुष।
उसके चेहरे की मुस्कान ऐसी थी कि उसे देखकर मन के सभी भय और दुःख स्वयं मिट जाएँ।
काकभुशुण्डि का हृदय काँप उठा।
उन्होंने मन ही मन सोचा—
"क्या यह... मेरे प्रभु हैं?"
पर अगले ही क्षण उनके मन में संदेह भी आया।
"कहीं यह मेरी कल्पना तो नहीं?"
बालक मुस्कुराया।
उसने कुछ नहीं कहा।
बस धीरे-धीरे वटवृक्ष के चारों ओर घूमने लगा।
काकभुशुण्डि उसकी ओर देखते ही रह गए।
अचानक बालक ने पीछे मुड़कर देखा।
उसकी आँखों में अनंत करुणा थी।
वह मुस्कुराकर बोला—
"भुशुण्डि..."
बस...
एक शब्द।
लेकिन उस एक शब्द में ऐसा अपनापन था कि काकभुशुण्डि की आँखों से अश्रु बह निकले।
वे वृक्ष से नीचे उतर आए और उस बालक के चरणों में गिर पड़े।
काँपती हुई आवाज़ में उन्होंने पूछा—
"प्रभु... क्या सचमुच आप ही श्रीराम हैं?"
बालक ने उत्तर नहीं दिया।
उसने केवल अपने कोमल हाथ से काकभुशुण्डि के सिर को स्पर्श किया।
उसी क्षण...
काकभुशुण्डि को लगा कि उनका शरीर पृथ्वी पर है, लेकिन आत्मा किसी और लोक में पहुँच गई है।
उन्होंने अपने सामने अद्भुत दृश्य देखे।
उन्होंने देखा—
सृष्टि की रचना हो रही है।
फिर प्रलय आ रहा है।
फिर नई सृष्टि बन रही है।
फिर एक और त्रेतायुग...
फिर अयोध्या...
फिर राजा दशरथ...
फिर श्रीराम का जन्म...
फिर वनवास...
फिर रावण-वध...
फिर राज्याभिषेक...
और यह सब केवल एक बार नहीं...
बार-बार...
असंख्य बार...
हर कल्प में...
हर सृष्टि में...
राम की लीला फिर से घटित हो रही थी।
काकभुशुण्डि विस्मित रह गए।
उन्होंने समझ लिया—
श्रीराम केवल अयोध्या के राजकुमार नहीं हैं।
वे स्वयं काल के भी स्वामी हैं।
कुछ देर बाद वह दिव्य दृश्य समाप्त हो गया।
काकभुशुण्डि ने स्वयं को फिर उसी वटवृक्ष के नीचे पाया।
वह बालक अब भी उनके सामने खड़ा था।
इस बार उसने मधुर स्वर में कहा—
"भक्ति वह द्वार है, जहाँ समय का कोई अधिकार नहीं चलता।"
"तुमने ज्ञान से अधिक प्रेम को चुना है।"
"इसी कारण आज मैं तुम्हें एक वरदान देता हूँ।"
काकभुशुण्डि ने सिर झुका लिया।
"प्रभु, मुझे कुछ नहीं चाहिए।"
"बस आपका नाम कभी न छूटे।"
श्रीराम मुस्कुराए।
"तथास्तु।"
"आज से काल तुम्हें बाँध नहीं सकेगा।"
"तुम असंख्य कल्पों तक जीवित रहोगे।"
"तुम मेरी प्रत्येक लीला के साक्षी बनोगे।"
"जो श्रद्धा से तुम्हारी रामकथा सुनेगा, उसके मन का अज्ञान दूर होगा।"
यह कहते ही वह दिव्य बालक धीरे-धीरे प्रकाश में विलीन होने लगा।
काकभुशुण्डि रो पड़े।
उन्होंने पुकारा—
"प्रभु... मुझे छोड़कर मत जाइए..."
आकाश से केवल एक मधुर स्वर सुनाई दिया—
"मैं कहीं नहीं जाता, भुशुण्डि... जहाँ रामनाम है, वहीं मैं हूँ।"
और फिर...
पूरा नील पर्वत फिर से शांत हो गया।
लेकिन उस दिन के बाद काकभुशुण्डि कभी अकेले नहीं रहे।
उन्हें हर श्वास में श्रीराम का साक्षात् अनुभव होने लगा।

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