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Kakabhushundi

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 हिमालय की ऊँची चोटियों पर उस दिन सूर्य की पहली किरणें धीरे-धीरे बर्फ़ से ढकी शिलाओं को स्वर्णिम बना रही थीं। हवा में देवदार के वृक्षों की सुगंध घुली हुई थी, और दूर कहीं एक शांत सरोवर का जल बिना किसी हलचल के आकाश का प्रतिबिंब समेटे हुए था। उसी पर्वत पर एक प्राचीन वटवृक्ष खड़ा था। कहा जाता था कि उस वृक्ष ने असंख्य युगों का परिवर्तन देखा था। उसकी जड़ें धरती की गहराइयों तक जाती थीं और उसकी शाखाएँ मानो आकाश से संवाद करती थीं। उसकी सबसे ऊँची डाल पर एक कौआ बैठा था। पर वह साधारण कौआ नहीं था। उसकी आँखों में ऐसा तेज था, जिसे देखकर बड़े-बड़े ऋषि भी सम्मान से अपना मस्तक झुका देते थे। उसके मुख से हर श्वास के साथ केवल एक ही नाम निकलता— "राम..." उस नाम की ध्वनि इतनी मधुर थी कि आसपास बैठी चिड़ियाँ भी चहचहाना भूल जातीं। कई ऋषि मौन भाव से उसकी वाणी सुन रहे थे। उसी समय आकाश में विशाल पंखों की छाया फैली। वह थे— गरुड़। उनकी गति वज्र के समान तीव्र थी, किंतु आज उनके मुख पर विजय का नहीं, जिज्ञासा का भाव था। उन्होंने वटवृक्ष के समीप उतरकर उस कौए को देखा और मन ही मन सोचा— "क्या यही...